श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.115.33 
तत: स्नुषां स भगवान् प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत्।
वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
भगवान भृगु बहुत प्रसन्न हुए और अपनी पुत्रवधू से बोले - 'सौभाग्यवती पुत्रवधू! कोई भी वर मांगो, मैं तुम्हारी इच्छानुसार वर प्रदान करूंगा।'
 
Lord Bhrigu became very pleased and said to his daughter-in-law - 'Fortunate daughter-in-law! Ask for any boon; I will grant you the boon as per your wish.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)