श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.115.24 
न चापि भगवान् वाच्यो दीयतामिति भार्गव।
देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'भृगु नंदन! आप किसी भी प्रकार की निंदा के पात्र नहीं हैं। कृपया यह शुल्क अदा कर दीजिए, मैं अपनी पुत्री का विवाह आप जैसे महापुरुष से अवश्य करूँगा।'
 
'Bhrigu Nandan! You are not a person of any condemnation. Please pay this fee and I will surely marry my daughter to a great soul like you.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)