श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.114.5 
ऋषिभि: समुपायुक्तं यज्ञियं गिरिशोभितम्।
उत्तरं तीरमेतद्धि सततं द्विजसेवितम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यह वैतरणी का वही उत्तरी तट है, जो पर्वत-श्रेणियों से सुशोभित है, जहाँ यज्ञ सम्पन्न हुआ था। अनेक ऋषि-मुनि और ब्राह्मण सदैव इसी उत्तरी तट का उपयोग करते रहे हैं।॥5॥
 
This is the same northern bank of the Vaitarni, adorned with mountain ranges, where the yajna was performed. Many sages and Brahmins have always used this northern bank. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)