श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.114.30 
वैशम्पायन उवाच
तत: कृतस्वस्त्ययनो महात्मा
युधिष्ठिर: सागरमभ्यगच्छत्।
कृत्वा च तच्छासनमस्य सर्वं
महेन्द्रमासाद्य निशामुवास॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात लोमशजी के स्वस्तिवाचन के पश्चात महात्मा राजा युधिष्ठिर ने उनके द्वारा बताई गई समस्त विधि का पालन करते हुए स्नान करने के लिए समुद्र में प्रवेश किया। इसके बाद हमने महेन्द्र पर्वत पर जाकर रात्रि विश्राम किया। 30॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, after reciting the Swasti of Lomashji, Mahatma King Yudhishthir, following all the procedures prescribed by him, entered the sea to take bath. After this, we went to Mahendra Parvat and spent the night. 30॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां महेन्द्राचलगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें महेन्द्राचलगमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)