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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन
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श्लोक 21
श्लोक
3.114.21
विषीदन्तीं तु तां दृष्ट्वा कश्यपो भगवानृषि:।
प्रसादयाम्बभूवाथ ततो भूमिं विशाम्पते॥ २१॥
अनुवाद
राजन! देवी पृथ्वी का दुःख देखकर महर्षि भगवान कश्यप ने अपनी प्रार्थना से उन्हें प्रसन्न किया। 21॥
Rajan! Seeing the sorrow of Goddess Earth, Maharishi Lord Kashyapa pleased her with his prayers. 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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