श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  3.114.19-20 
अवासीदच्च कौन्तेय दत्तमात्रा मही तदा।
उवाच चापि कुपिता लोकेश्वरमिदं प्रभुम्॥ १९॥
न मां मर्त्याय भगवन् कस्मैचिद् दातुमर्हसि।
प्रदानं मोघमेतत् ते यास्याम्येषा रसातलम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! उनके द्वारा दान देते ही पृथ्वी अत्यन्त दुःखी हो गई और क्रोधित होकर ब्रह्माजी से इस प्रकार बोली - 'प्रभो! मुझे किसी मनुष्य को मत सौंपिए। यदि आप मुझे किसी मनुष्य को सौंपेंगे तो वह व्यर्थ होगा, क्योंकि मैं तुरन्त ही पाताल लोक में चली जाऊँगी।'॥19-20॥
 
O son of Kunti! As soon as she was donated by him, the earth became very sad and angrily spoke to Lord Brahma in this manner - 'Lord! Do not hand me over to any human being. If you hand me over to a human being, it will be futile because I will immediately go to the netherworld.'॥ 19-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)