श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक d1h-24
 
 
श्लोक  3.113.d1h-24 
नारायणी चेन्द्रसेना बभूव
वश्या नित्यं मुद्‍गलस्याजमीढ।
(यथा सीता दाशरथेर्महात्मनो
यथा तव द्रौपदी पाण्डुपुत्र।)
तथा शान्ता ऋष्यशृङ्गं वनस्थं
प्रीत्या युक्ता पर्यचरन्नरेन्द्र॥ २४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! जैसे नारायणी इन्द्रसेना सदैव महर्षि मुद्गल और पाण्डुनन्दन के अधीन रहती थीं! जैसे सीता महात्मा दशरथनन्दन श्री राम के अधीन और द्रौपदी सदैव आपके अधीन रही हैं, उसी प्रकार शांता भी सदैव आपके अधीन रहकर वनवासी ऋष्यश्रृंग की प्रसन्नतापूर्वक सेवा करती थीं॥24॥
 
Yudhisthira! Like Narayani Indrasena always remained under Maharishi Mudgal and Pandunandan! Just as Sita has been under the control of Mahatma Dashrathanandan Shri Ram and Draupadi has always been under your control, in the same way Shanta also always remained under your control and happily served the forest resident Rishyashringa. 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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