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mahabharat 3.113.8: राजा! तत्पश्चात् उस वेश्या ने चतुराई से विभाण्डक ऋषि के इकलौते पुत्र को नाव में बिठा लिया और नाव को आगे बढ़ा दिया। फिर वे सभी कन्याएँ नाना प्रकार से उनका सत्कार करती हुई अंगराज के पास पहुँचीं।   |   mahabharat अध्याय 3.113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.113.8 
ततो राजन् काश्यपस्यैकपुत्रं
प्रवेश्य योगेन विमुच्य नावम्।
प्रमोदयन्त्यो विविधैरुपायै-
राजग्मुरङ्गाधिपते: समीपम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
राजा! तत्पश्चात् उस वेश्या ने चतुराई से विभाण्डक ऋषि के इकलौते पुत्र को नाव में बिठा लिया और नाव को आगे बढ़ा दिया। फिर वे सभी कन्याएँ नाना प्रकार से उनका सत्कार करती हुई अंगराज के पास पहुँचीं।
 
King! Thereafter the prostitute cleverly took the only son of sage Vibhandak into the boat and launched the boat. Then all the girls came to the king of Angas, entertaining him with various means.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)