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श्लोक 3.113.25  |
तस्याश्रम: पुण्य एषोऽवभाति
महाह्रदं शोभयन् पुण्यकीर्ति:।
अत्र स्नात: कृतकृत्यो विशुद्ध-
स्तीर्थान्यन्यान्यनुसंयाहि राजन्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन, पवित्र कीर्ति से परिपूर्ण यह उनका पुण्य आश्रम इस महान् सरोवर की शोभा बढ़ाते हुए प्रकाशित हो रहा है! यहाँ स्नान करके तुम पवित्र और कृतज्ञ हो जाओ और अन्य तीर्थस्थानों की यात्रा करो॥25॥ |
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| This virtuous ashram of his, which is full of sacred fame, is being illuminated adding to the beauty of this great pond, O king! After taking bath here, become pure and grateful and travel to other places of pilgrimage. 25॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका आधा श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं) |
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