श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.113.23 
अरुन्धती वा सुभगा वसिष्ठं
लोपामुद्रा वा यथा ह्यगस्त्यम्।
नलस्य वै दमयन्ती यथाभूद्
यथा शची वज्रधरस्य चैव॥ २३॥
 
 
अनुवाद
या जैसे सौभाग्यशाली अरुंधति वशिष्ठजी की, लोपामुद्रा अगस्त्यजी की, दमयंती नलकी की और शची वज्रधारी इंद्र की सेवा करती हैं। 23॥
 
Or like the fortunate Arundhati serves Vashishthaji, Lopamudra serves Agastyaji, Damayanti Nalaki and Shachi serves Vajradhari Indra. 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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