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mahabharat 3.113.18: सब देशों में आदरणीय पुरुष के मधुर वचन सुनकर ऋषि का रजोगुण से उत्पन्न अत्यन्त क्रोध शान्त हो गया और वे प्रसन्नतापूर्वक राजधानी में जाकर अंग देश के राजा से मिले॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.113.18 
देशेषु देशेषु स पूज्यमान-
स्तांश्चैव शृण्वन् मधुरान् प्रलापान्।
प्रशान्तभूयिष्ठरजा: प्रहृष्ट:
समाससादाङ्गपतिं पुरस्थम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
सब देशों में आदरणीय पुरुष के मधुर वचन सुनकर ऋषि का रजोगुण से उत्पन्न अत्यन्त क्रोध शान्त हो गया और वे प्रसन्नतापूर्वक राजधानी में जाकर अंग देश के राजा से मिले॥18॥
 
Hearing the sweet words of one who is respected in every country, the sage's extreme anger born of Rajoguna was completely pacified. He happily went to the capital and met the king of Angas.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)