श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.113.17 
अवाप्य सत्कारमतीव तेभ्य:
प्रोवाच कस्य प्रथिता: स्थ गोपा:।
ऊचुस्ततस्तेऽभ्युपगम्य सर्वे
धनं तवेदं विहितं सुतस्य॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ग्वालों से बड़ा आतिथ्य पाकर ऋषि ने पूछा, ‘तुम किसके ग्वाले हो?’ तब वे सभी उनके पास आए और बोले, ‘यह सारा धन आपके पुत्र का है।’
 
After receiving great hospitality from the cowherds, the sage asked, 'Whose cowherd are you?' Then all of them came near him and said, 'All this wealth belongs to your son.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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