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mahabharat 3.113.16: थके-मांदे और भूखे विभाण्डक ऋषि संध्या समय उन समृद्ध गोशालाओं में गए। ग्वालों ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया। वे राजा के समान सुख-सुविधाओं से युक्त होकर रात भर वहीं रहे॥16॥   |   mahabharat अध्याय 3.113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.113.16 
स वै श्रान्त: क्षुधित: काश्यपस्तान्
घोषान् समासादितवान् समृद्धान्।
गोपैश्च तैर्विधिवत् पूज्यमानो
राजेव तां रात्रिमुवास तत्र॥ १६॥
 
 
अनुवाद
थके-मांदे और भूखे विभाण्डक ऋषि संध्या समय उन समृद्ध गोशालाओं में गए। ग्वालों ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया। वे राजा के समान सुख-सुविधाओं से युक्त होकर रात भर वहीं रहे॥16॥
 
Tired and hungry, the sage Vibhandak went to those prosperous cattle sheds in the evening. The cowherds worshipped him according to the rituals. He stayed there all night with all the comforts and amenities like a king.॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)