श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.113.14 
अथोपायात् स मुनिश्चण्डकोप:
स्वमाश्रमं मूलफलं गृहीत्वा।
अन्वेषमाणश्च न तत्र पुत्रं
ददर्श चुक्रोध ततो भृशं स:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इधर महापुरुष विभाण्डक क्रोध में भरकर फल-मूल लेकर अपने आश्रम में आये। बहुत खोजने पर भी जब उन्हें अपना पुत्र नहीं मिला, तो वे अत्यन्त क्रोधित हुए ॥14॥
 
Here the great soul Vibhandak, filled with rage, came to his hermitage with fruits and roots. When he did not find his son even after a lot of searching, he became very angry. ॥14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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