श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 113: ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.113.12-13 
विभाण्डकस्याव्रजत: स राजा
पशून् प्रभूतान् पशुपांश्च वीरान्।
समादिशत् पुत्रगृद्धी महर्षि-
र्विभाण्डक: परिपृच्छेद् यदा व:॥ १२॥
स वक्तव्य: प्राञ्जलिभिर्भवद्भि:
पुत्रस्य ते पशव: कर्षणं च।
किं ते प्रियं वै क्रियतां महर्षे
दासा: स्म सर्वे तव वाचि बद्धा:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
राजा ने विभाण्डक ऋषि के मार्ग में बहुत से पशु तथा वीर पशुरक्षक भी तैनात कर दिए थे और सबको आज्ञा दी थी कि जब पुत्र की इच्छा रखने वाले विभाण्डक ऋषि तुमसे पूछें, तब तुम हाथ जोड़कर उन्हें इस प्रकार उत्तर देना - 'ये सब आपके पुत्र के पशु हैं, ये खेत भी उसी के द्वारा जोते जा रहे हैं। महर्षि! कृपया हमें आज्ञा दीजिए कि हम आपके प्रिय कार्यों में से कौन-सा कार्य करें। हम सब आपके आज्ञाकारी दास हैं।'॥12-13॥
 
The king had also posted many animals and brave cattle guards on the path of sage Vibhandak and had ordered everyone that when sage Vibhandak, who desires a son, asks you, then with folded hands you should reply to him like this - 'All these are the animals of your son, these fields are also being ploughed by him. Maharishi! Please order us, which of your favourite tasks should we perform. We are all your obedient slaves.'॥12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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