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mahabharat 3.112.8: हे प्रिये! जैसे माधव (वैशाख) मास में वन की वाटिका (उपवन) वायु के प्रवाह से सुशोभित होती है, उसी प्रकार पवनदेव से सेवित वह ब्रह्मचारी उत्तम एवं पवित्र गन्ध से सुगन्धित एवं सुशोभित हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.112.8 
यथा वनं माधवमासि मध्ये
समीरितं श्वसनेनेव भाति।
तथा स भात्युत्तमपुण्यगन्धी
निषेव्यमाण: पवनेन तात॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! जैसे माधव (वैशाख) मास में वन की वाटिका (उपवन) वायु के प्रवाह से सुशोभित होती है, उसी प्रकार पवनदेव से सेवित वह ब्रह्मचारी उत्तम एवं पवित्र गन्ध से सुगन्धित एवं सुशोभित हो रहा था।
 
O dear! Just as a forest orchard is adorned by the (fragrant) breeze in the month of Madhava (Vaisakha or spring), in the same way that brahmacari, served by the Wind-God, was becoming fragrant and adorned with the excellent and sacred smell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)