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mahabharat 3.112.7: उनका चेहरा भी देखने लायक था। बहुत सुंदर था। ब्रह्मचारी के मुँह से निकला हर शब्द मन को आनंद के सागर में डुबो देता था। उनकी आवाज़ कोयल जैसी थी, जिसे एक बार सुनने के बाद, मेरी आत्मा उसे दोबारा सुनने के लिए तरस रही है।   |   mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.112.7 
वक्त्रं च तस्याद्‍भुतदर्शनीयं
प्रव्याहृतं ह्लादयतीव चेत:।
पुंस्कोकिलस्येव च तस्य वाणी
तां शृण्वतो मे व्यथितोऽन्तरात्मा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उनका चेहरा भी देखने लायक था। बहुत सुंदर था। ब्रह्मचारी के मुँह से निकला हर शब्द मन को आनंद के सागर में डुबो देता था। उनकी आवाज़ कोयल जैसी थी, जिसे एक बार सुनने के बाद, मेरी आत्मा उसे दोबारा सुनने के लिए तरस रही है।
 
His face was also worth seeing. It was very beautiful. Every word spoken by the Brahmachari would make the mind drown in an ocean of bliss. His voice was like that of a cuckoo, and after hearing it once, my soul is yearning to hear it again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)