Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.112.6: जब भी वह ब्रह्मचारी थोड़ा हिलता-डुलता या टहलता, उसके आभूषणों से बड़ी सुंदर झनकार निकलती, मानो सरोवर में हंस चहचहा रहे हों। उसके वस्त्र भी बहुत सुंदर लगते थे। मेरी लंगोटी में ये छाल के वस्त्र इतने सुंदर नहीं हैं। | mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जब भी वह ब्रह्मचारी थोड़ा हिलता-डुलता या टहलता, उसके आभूषणों से बड़ी सुंदर झनकार निकलती, मानो सरोवर में हंस चहचहा रहे हों। उसके वस्त्र भी बहुत सुंदर लगते थे। मेरी लंगोटी में ये छाल के वस्त्र इतने सुंदर नहीं हैं।
Whenever that brahmacari moved or walked a little, his ornaments produced a very beautiful tinkling sound, as if the swans were chirping in a lake. His clothes also looked wonderful. These bark clothes in my loincloth are not that beautiful.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥