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mahabharat 3.112.3: उनके गले में एक अद्भुत आभूषण (कण्ठ) था जो आकाश में बिजली की तरह चमक रहा था। उनकी गर्दन के नीचे (छाती पर) दो मांसल पिंड थे जिन पर एक भी बाल नहीं था। वे अत्यंत सुंदर लग रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.112.3 
आश्चर्यरूपा पुनरस्य कण्ठे
विभ्राजते विद्युदिवान्तरिक्षे।
द्वौ चास्य पिण्डावधरेण कण्ठा-
दजातरोमौ सुमनोहरौ च॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उनके गले में एक अद्भुत आभूषण (कण्ठ) था जो आकाश में बिजली की तरह चमक रहा था। उनकी गर्दन के नीचे (छाती पर) दो मांसल पिंड थे जिन पर एक भी बाल नहीं था। वे अत्यंत सुंदर लग रहे थे।
 
Around his neck was an astonishing ornament (kantha) which was shining like lightning in the sky. Below his neck (on his chest) were two fleshy lumps on which there was no hair. They looked extremely beautiful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)