Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.112.19: मेरे मन में भी वही तप करने की इच्छा है। यदि मैं उनका दर्शन न करूँ तो मेरा मन व्यथित ही रहेगा ॥19॥ | mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
चर्तुं तथेच्छा हृदये ममास्ति
दुनोति चित्तं यदि तं न पश्ये॥ १९॥
अनुवाद
मेरे मन में भी वही तप करने की इच्छा है। यदि मैं उनका दर्शन न करूँ तो मेरा मन व्यथित ही रहेगा ॥19॥
I too have a desire in my heart to perform the same penance. If I do not see him, my mind will continue to be distressed. ॥ 19॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने द्वादशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११२॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥