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mahabharat 3.112.18: पिता जी! मैं उनके पास जाकर देखूँगा कि वे किस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। जिस प्रकार आर्यधर्म का पालन करने वाला वह ब्रह्मचारी तप करता है, उसी प्रकार मैं भी उनके साथ रहकर वैसा ही तप करना चाहता हूँ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.112.18 
गच्छामि तस्यान्तिकमेव तात
का नाम सा ब्रह्मचर्या च तस्य।
इच्छाम्यहं चरितुं तेन सार्धं
यथा तप: स चरत्यार्यधर्मा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! मैं उनके पास जाकर देखूँगा कि वे किस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। जिस प्रकार आर्यधर्म का पालन करने वाला वह ब्रह्मचारी तप करता है, उसी प्रकार मैं भी उनके साथ रहकर वैसा ही तप करना चाहता हूँ॥18॥
 
Father! I will go to him and see how he practices celibacy. The way that brahmacari who follows the Aryadharma practices penance, I too want to live with him and do the same penance.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)