Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.112.16: उसने रेशमी धागों से ये विचित्र सुगन्धित मालाएँ बनाई थीं। उन्हें यहाँ बिखेरकर, वह ब्रह्मचारी अपनी तपस्या से प्रकाशित होकर अपने आश्रम को लौट गया था। | mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इमानि चित्राणि च गन्धवन्ति
माल्यानि तस्योद्ग्रथितानि पट्टै:।
यानि प्रकीर्येह गत: स्वमेव
स आश्रमं तपसा द्योतमान:॥ १६॥
अनुवाद
उसने रेशमी धागों से ये विचित्र सुगन्धित मालाएँ बनाई थीं। उन्हें यहाँ बिखेरकर, वह ब्रह्मचारी अपनी तपस्या से प्रकाशित होकर अपने आश्रम को लौट गया था।
He had made these strange fragrant garlands by weaving silken strings. After scattering them here, that brahmacari, illuminated by his austerities, had gone back to his hermitage.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥