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mahabharat 3.112.13: मैंने जो जल दिया, उस पर उसने अधिक ध्यान नहीं दिया। मैंने जो फल दिए, उन्हें भी उसने स्वीकार नहीं किया और मुझसे कहा, 'यही मेरा नियम है।' उसने मुझे कुछ अन्य फल भी दिए॥13॥   |   mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.112.13 
न चापि पाद्यं बहु मन्यतेऽसौ
फलानि चेमानि मयाऽऽहृतानि।
एवंव्रतोऽस्मीति च मामवोचत्
फलानि चान्यानि समाददन्मे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मैंने जो जल दिया, उस पर उसने अधिक ध्यान नहीं दिया। मैंने जो फल दिए, उन्हें भी उसने स्वीकार नहीं किया और मुझसे कहा, 'यही मेरा नियम है।' उसने मुझे कुछ अन्य फल भी दिए॥13॥
 
He did not pay much attention to the water I offered him. He did not accept the fruits I offered him and said to me, 'This is my rule.' He also offered me some other fruits.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)