Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.112.12: वे बार-बार मुझे गले लगाते, मेरे उलझे हुए केशों को पकड़ते, मेरा मुख मोड़कर मेरे मुख पर अपना मुख रखते। इस प्रकार मेरे मुख से अपना मुख लगाकर वे ऐसी वाणी बोलते, जिससे मेरे हृदय में अपार आनन्द उत्पन्न होता॥12॥ | mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स मे समाश्लिष्य पुन: शरीरं
जटासु गृह्याभ्यवनाम्य वक्त्रम्।
वक्त्रेण वक्त्रं प्रणिधाय शब्दं
चकार तन्मेऽजनयत् प्रहर्षम्॥ १२॥
अनुवाद
वे बार-बार मुझे गले लगाते, मेरे उलझे हुए केशों को पकड़ते, मेरा मुख मोड़कर मेरे मुख पर अपना मुख रखते। इस प्रकार मेरे मुख से अपना मुख लगाकर वे ऐसी वाणी बोलते, जिससे मेरे हृदय में अपार आनन्द उत्पन्न होता॥12॥
Again and again he would embrace me, hold my matted hair, bend my face and place his face on mine. In this way, with his mouth pressed against mine, he spoke a sound which generated immense joy in my heart.॥ 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥