Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.112.1: ऋष्यश्रृंग बोले- पिताश्री! यहाँ एक जटाधारी ब्रह्मचारी आया था। वह न तो युवा था, न वृद्ध। उसका हृदय बड़ा उदार था। उसके शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान थी और उसके विशाल नेत्र कमल के समान थे। वह स्वयं देवताओं के समान शोभायमान था॥1॥ | mahabharat अध्याय 3.112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ऋष्यशृङ्ग उवाच
इहागतो जटिलो ब्रह्मचारी
न वै ह्रस्वो नातिदीर्घो मनस्वी।
सुवर्णवर्ण: कमलायताक्ष:
स्वत: सुराणामिव शोभमान:॥ १॥
अनुवाद
ऋष्यश्रृंग बोले- पिताश्री! यहाँ एक जटाधारी ब्रह्मचारी आया था। वह न तो युवा था, न वृद्ध। उसका हृदय बड़ा उदार था। उसके शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान थी और उसके विशाल नेत्र कमल के समान थे। वह स्वयं देवताओं के समान शोभायमान था॥1॥
Rishyashringa said- Father! A brahmachari with matted hair came here. He was neither young nor old. He had a very generous heart. The luster of his body was like gold and his large eyes looked like lotuses. He himself was looking as graceful as the gods.॥1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥