श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 111: वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.111.2 
नानापुष्पफलैर्वृक्षै: कृत्रिमैरुपशोभितै:।
नानागुल्मलतोपेतै: स्वादुकामफलप्रदै:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वह आश्रम नाना प्रकार के पुष्पों और फलों से सुशोभित कृत्रिम वृक्षों से घिरा हुआ था। उन वृक्षों पर नाना प्रकार की झाड़ियाँ और लताएँ फैली हुई थीं और वे वृक्ष स्वादिष्ट तथा मनभावन फल देने वाले थे॥ 2॥
 
That ashram was surrounded by artificial trees decorated with various flowers and fruits. Various types of bushes and creepers were spread on those trees and those trees gave delicious and desirable fruits.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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