श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 111: वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.111.18 
अथर्ष्यशृङ्गं विकृतं समीक्ष्य
पुन: पुन: पीडॺ च कायमस्य।
अवेक्ष्यमाणा शनकैर्जगाम
कृत्वाग्निहोत्रस्य तदापदेशम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
ऋष्यश्रृंग की आकृति में थोड़ी-सी विकृति देखकर वह बार-बार उनसे लिपट गई और अग्निहोत्र के बहाने उन्हें देखते हुए धीरे-धीरे वहाँ से चली गई॥18॥
 
Seeing a slight deformity in Rishyashringa's figure, she repeatedly embraced him and under the pretext of Agnihotra, she slowly walked away from there, being watched by him.॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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