श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 111: वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.111.14 
लोमश उवाच
सा तानि सर्वाणि विवर्जयित्वा
भक्ष्याण्यनर्हाणि ददौ ततोऽस्य।
तान्यृष्यशृङ्गस्य महारसानि
भृशं सुरूपाणि रुचिं ददुर्हि॥ १४॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं- राजन! तत्पश्चात उस वेश्या ने वे सब फल छोड़कर स्वयं ही ऋष्यश्रृंग को अत्यन्त सुन्दर एवं अमूल्य खाद्य पदार्थ (फल आदि) दिए। उन अत्यन्त रसीले फलों ने उनकी रुचि बढ़ा दी।
 
Lomashji says- Rajan! Thereafter, the prostitute left all those fruits and gave very beautiful and priceless edible items (fruits etc.) to Rishya Shringa herself. Those extremely juicy fruits increased his interest. 14॥
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