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mahabharat 3.110.9-11: दूसरों के द्वारा पुकारे जाने पर क्रोधित होकर उन्होंने पर्वत से कहा, ‘यहाँ जो कोई बोले, उस पर ओले बरसाओ।’ इसी प्रकार वायु को बुलाकर तपस्वी ऋषि ने कहा, ‘देखो, यहाँ किसी प्रकार की ध्वनि नहीं होनी चाहिए।’ तब से यहाँ जो कोई बोलता है, उसे बादलों की गर्जना रोक देती है। हे राजन! इस प्रकार महामुनि ने ये अद्भुत कार्य किए हैं। क्रोधवश ही उन्होंने कुछ कर्मों का विधान और कुछ का निषेध किया है।॥9-11॥   |   mahabharat अध्याय 3.110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न  »  श्लोक 9-11
 
 
श्लोक  3.110.9-11 
स वै सम्भाष्यमाणोऽन्यै: कोपाद् गिरिमुवाच ह।
य इह व्याहरेत् कश्चिदुपलानुत्सृजेस्तथा॥ ९॥
वातं चाहूय मा शब्दमित्युवाच स तापस:।
व्याहरंश्चेह पुरुषो मेघशब्देन वार्यते॥ १०॥
एवमेतानि कर्माणि राजंस्तेन महर्षिणा।
कृतानि कानिचित् क्रोधात् प्रतिषिद्धानि कानिचित्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
दूसरों के द्वारा पुकारे जाने पर क्रोधित होकर उन्होंने पर्वत से कहा, ‘यहाँ जो कोई बोले, उस पर ओले बरसाओ।’ इसी प्रकार वायु को बुलाकर तपस्वी ऋषि ने कहा, ‘देखो, यहाँ किसी प्रकार की ध्वनि नहीं होनी चाहिए।’ तब से यहाँ जो कोई बोलता है, उसे बादलों की गर्जना रोक देती है। हे राजन! इस प्रकार महामुनि ने ये अद्भुत कार्य किए हैं। क्रोधवश ही उन्होंने कुछ कर्मों का विधान और कुछ का निषेध किया है।॥9-11॥
 
Enraged at being called by others, he said to the mountain, 'Shower hailstones on anyone who speaks here.' Similarly, calling the wind, the ascetic sage said, 'Look, there should be no sound of any kind here.' Since then, whoever speaks here is stopped by the roaring of the clouds. O King! In this way, the great sage has done these wonderful deeds. In anger, he has ordained some deeds and prohibited some things.॥ 9-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)