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mahabharat 3.110.40: हे मनुष्यों के स्वामी! उसने पहले कभी अपने पिता के अतिरिक्त किसी अन्य मनुष्य को नहीं देखा था, इसलिए उसका मन स्वभाव से ही सदैव ब्रह्मचर्य में लगा रहता था ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 3.110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.110.40 
न तेन दृष्टपूर्वोऽन्य: पितुरन्यत्र मानुष:।
तस्मात् तस्य मनो नित्यं ब्रह्मचर्येऽभवन्नृप॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! उसने पहले कभी अपने पिता के अतिरिक्त किसी अन्य मनुष्य को नहीं देखा था, इसलिए उसका मन स्वभाव से ही सदैव ब्रह्मचर्य में लगा रहता था ॥40॥
 
O lord of men! He had never seen any other human being except his father before, so his mind was always engaged in celibacy by nature. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)