Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.110.17: यह दूर्वा (घास) कुशा के समान प्रतीत होती है और यह भूमि ऐसी प्रतीत होती है मानो इस पर कुशा बिछा दी गई हो। महाराज! ये वृक्ष भी यज्ञ के समान प्रतीत होते हैं॥17॥ | mahabharat अध्याय 3.110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कुशाकारेव दूर्वेयं संस्तीर्णेव च भूरियम्।
यूपप्रकारा बहवो वृक्षाश्चेमे विशाम्पते॥ १७॥
अनुवाद
यह दूर्वा (घास) कुशा के समान प्रतीत होती है और यह भूमि ऐसी प्रतीत होती है मानो इस पर कुशा बिछा दी गई हो। महाराज! ये वृक्ष भी यज्ञ के समान प्रतीत होते हैं॥17॥
This durva (grass) appears to be in the shape of a kusha grass and this land looks as if kusha grass has been spread on it. Maharaj! These trees also appear to be like sacrificial offerings.॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥