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mahabharat 3.110.14: हे कुन्तीपुत्र! तब से सामान्य मनुष्य इस पर्वत को देख भी नहीं सकते, चढ़ना तो दूर की बात है॥14॥   |   mahabharat अध्याय 3.110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.110.14 
तदाप्रभृति कौन्तेय नरा गिरिमिमं सदा।
नाशक्नुवन्नभिद्रष्टुं कुत एवाधिरोहितुम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! तब से सामान्य मनुष्य इस पर्वत को देख भी नहीं सकते, चढ़ना तो दूर की बात है॥14॥
 
O son of Kunti! Since then ordinary men cannot even see this mountain, let alone climb it. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)