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mahabharat 3.110.1: वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ने लगे। वे पाप और भय को दूर करने वाली नन्दा और अपर्णा इन दो नदियों के पास पहुँचे। 1॥   |   mahabharat अध्याय 3.110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.110.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: प्रयात: कौन्तेय: क्रमेण भरतर्षभ।
नन्दामपरनन्दां च नद्यौ पापभयापहे॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ने लगे। वे पाप और भय को दूर करने वाली नन्दा और अपर्णा इन दो नदियों के पास पहुँचे। 1॥
 
Vaishampayanji says- Bharatshrestha! Thereafter Kuntinandan Yudhishthir started moving forward gradually. He traveled to these two rivers, Nanda and Aparnanda, which remove sin and fear. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)