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mahabharat 3.11.75: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युद्ध में महादैत्य किर्मीर के मारे जाने का समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त चिन्तित हो गये और शोकग्रस्त पुरुष की भाँति आहें भरने लगे।   |   mahabharat अध्याय 3.11: भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.11.75 
वैशम्पायन उवाच
एवं विनिहतं संख्ये किर्मीरं रक्षसां वरम्।
श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत् तदा॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युद्ध में महादैत्य किर्मीर के मारे जाने का समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त चिन्तित हो गये और शोकग्रस्त पुरुष की भाँति आहें भरने लगे।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing of the killing of the great demon Kirmir in the war, king Dhritarashtra was deeply worried and began to sigh like a grief-stricken man.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि किर्मीरवधपर्वणि विदुरवाक्ये एकादशोऽध्याय:॥ ११॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत किर्मीरवधपर्वमें विदुरवाक्यसम्बन्धी ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)