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mahabharat 3.11.67: ऐसा कहकर वीर भीमसेन ने क्रोध से भरे हुए हृदय से उस राक्षस को छोड़ दिया, जिसके वस्त्र और आभूषण इधर-उधर गिर गए थे और जिसका मन मरणासन्न अवस्था में था।   |   mahabharat अध्याय 3.11: भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 11: भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  3.11.67 
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर-
स्तं राक्षसं क्रोधपरीतचेता:।
विस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त-
मुद्‍भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर वीर भीमसेन ने क्रोध से भरे हुए हृदय से उस राक्षस को छोड़ दिया, जिसके वस्त्र और आभूषण इधर-उधर गिर गए थे और जिसका मन मरणासन्न अवस्था में था।
 
Having said this, the valiant Bhima, with his heart filled with anger, let go of the demon, whose clothes and ornaments had slipped and fallen here and there and whose mind was in a trance, after he had died.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)