| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 11: भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा » श्लोक 42-44 |
|
| | | | श्लोक 3.11.42-44  | इत्युक्त्वैनमतिक्रुद्ध: कक्ष्यामुत्पीडॺ पाण्डव:।
निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटो बली॥ ४२॥
तमभ्यधावद् वेगेन भीमो वृक्षायुधस्तदा।
यमदण्डप्रतीकाशं ततस्तं तस्य मूर्धनि॥ ४३॥
पातयामास वेगेन कुलिशं मघवानिव।
असम्भ्रान्तं तु तद् रक्ष: समरे प्रत्यदृश्यत॥ ४४॥ | | | | | | अनुवाद | | ऐसा कहकर बलवान पाण्डवपुत्र भीम ने अत्यन्त क्रोध में भरकर अपने वस्त्र कमर में बाँधे, हाथों को आपस में रगड़ते हुए तथा दाँतों से होंठ काटते हुए, वृक्ष को अपना अस्त्र बनाकर बड़े वेग से उस राक्षस की ओर दौड़ा। जैसे इन्द्र वज्र से प्रहार करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने यमराज की गदा के समान उस भयानक वृक्ष को राक्षस के सिर पर बड़े जोर से मारा। फिर भी वह राक्षस युद्ध में अविचल खड़ा दिखाई दिया। | | | | Having said this, the powerful son of Pandava, Bhima, filled with great anger, girded his waist with his clothes and, rubbing his hands against each other and biting his lips with his teeth, he made the tree his weapon and ran towards the demon with great speed. Just as Indra strikes with a thunderbolt, in the same way he struck that dreadful tree, like the mace of Yama, on the demon's head with great force. Even then the demon was seen standing unmoved in the battle. | | ✨ ai-generated | | |
|
|