श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 11: भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  3.11.30-31 
सोऽयमासादितो दिष्टॺा भ्रातृहा काङ्क्षितश्चिरम्।
अनेन हि मम भ्राता बको विनिहत: प्रिय:॥ ३०॥
वैत्रकीयवने राजन् ब्राह्मणच्छद्मरूपिणा।
विद्याबलमुपाश्रित्य न ह्यस्त्यस्यौरसं बलम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'आज सौभाग्य से वह स्वयं मेरे पास आया है। भीम मेरे भाई का हत्यारा है। मैं उसे बहुत दिनों से ढूँढ़ रहा था। हे राजन! उसने वैत्रकीय वन में (एकचक्र नगरी के निकट) ब्राह्मण का वेश धारण करके वेदमंत्रों रूपी ज्ञान की शक्ति का आश्रय लेकर मेरे प्रिय भाई बकासुर का वध किया था। वह उसकी अपनी शक्ति नहीं थी।'
 
'Today, fortunately, he himself has come to me. Bhima is the murderer of my brother. I have been searching for him for a long time. O King! He had killed my dear brother Bakasura in the Vaitrakiya forest (near the city of Ekachakra) by taking the help of the power of knowledge in the form of Vedic mantras, assuming the disguise of a Brahmin. That was not his own power.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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