श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 109: पृथ्वीपर गंगाजीके उतरने और समुद्रको जलसे भरनेका विवरण तथा सगरपुत्रोंका उद्धार  »  श्लोक 10-13
 
 
श्लोक  3.109.10-13 
सा बभूव विसर्पन्ती त्रिधा राजन् समुद्रगा॥ १०॥
फेनपुञ्जाकुलजला हंसानामिव पङ्‍‍क्तय:।
क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचित् क्वचित्॥ ११॥
सा फेनपटसंवीता मत्तेव प्रमदाव्रजत्।
क्वचित् सा तोयनिनदैर्नदन्ती नादमुत्तमम्॥ १२॥
एवंप्रकारान् सुबहून् कुर्वती गगनाच्च्युता।
पृथिवीतलमासाद्य भगीरथमथाब्रवीत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! गिरते हुए झाग से आच्छादित जल वाली समुद्रगामी गंगा तीन धाराओं में विभक्त होकर हंसों की पंक्तियों के समान शोभायमान होने लगी। मतवाली स्त्री के समान वह इस प्रकार बहती हुई आई कि कभी सर्प के शरीर के समान टेढ़ी होकर बहती, कभी ऊँचाई से गिरकर चट्टानों से टकराती और श्वेत वस्त्र के समान झाग उसे ढक लेता। कभी जल की कलकल ध्वनि के साथ वह मनोहर संगीत गाती हुई प्रतीत हो रही थी। इस प्रकार अनेक रूप धारण करने वाली गंगा आकाश से गिरी और पृथ्वी पर पहुँचकर राजा भगीरथ से बोली -॥10-13॥
 
Maharaj! The ocean-going Ganga, with water covered with falling foam, divided into three streams and started looking beautiful like rows of swans. Like a drunken woman, it came in such a way that sometimes it was flowing in a crooked manner like the body of a snake and sometimes it was falling from a height and hitting the rocks and the foam, which looked like white clothes, was covering it. Sometimes it was singing a beautiful music with the gurgling sound of water. Thus, the Ganga, which assumed many forms, fell from the sky and on reaching the earth spoke to King Bhagirath -॥10-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)