श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 108: भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.108.6 
नदीकुञ्जनितम्बैश्च प्रासादैरुपशोभितम्।
गुहाकन्दरसंलीनसिंहव्याघ्रनिषेवितम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
यह पर्वत असंख्य नदियों, उपवनों, घाटियों और महलों (मंदिरों) से सुशोभित है। इस पर्वत पर सदैव गुफाओं और कंदराओं में छिपे शेर और बाघ रहते हैं।
 
It is greatly adorned by numerous rivers, groves, valleys and palaces (temples). This mountain is always served by lions and tigers hiding in caves and caverns.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas