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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 108: भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना
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श्लोक 22
श्लोक
3.108.22
करिष्यामि महाराज वचस्ते नात्र संशय:।
वेगं तु मम दुर्धार्यं पतन्त्या गगनाद् भुवम्॥ २२॥
अनुवाद
‘महाराज! मैं आपकी बात मानूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है; परंतु आकाश से पृथ्वी पर गिरते समय मेरी गति को रोकना बहुत कठिन है।
‘Maharaj! I will obey your words, there is no doubt about it; but it is very difficult to stop my speed while falling from the sky to the earth.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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