vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति
»
श्लोक 52
श्लोक
3.107.52
तत: प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत्।
उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत॥ ५२॥
अनुवाद
भरतवंशी महाराज! इससे पुण्यात्मा कपिलजी अंशुमान से प्रसन्न होकर बोले - 'मैं आपको वर देने को तैयार हूँ' ॥52॥
Bharatvanshi Maharaj! Due to this, the virtuous Kapilji became happy with Anshuman and said – 'I am ready to grant you a boon'. 52॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×