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mahabharat 3.106.21-22: इसी समय आकाशवाणी हुई - 'हे राजन! ऐसा करने का साहस मत करो। अपने इन पुत्रों का परित्याग करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। इस घड़े में से एक-एक बीज निकालकर उन्हें घी से भरे हुए गर्म कुंडों में अलग-अलग रखो और उनकी सावधानी से रक्षा करो।'   |   mahabharat अध्याय 3.106: राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 106: राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  3.106.21-22 
अथान्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गम्भीरनि:स्वनाम्।
राजन् मा साहसं कार्षी: पुत्रान्न त्यक्तुमर्हसि॥ २१॥
अलाबुमध्यान्निष्कृष्य बीजं यत्नेन गोप्यताम्।
सोपस्वेदेषु पात्रेषु घृतपूर्णेषु भागश:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इसी समय आकाशवाणी हुई - 'हे राजन! ऐसा करने का साहस मत करो। अपने इन पुत्रों का परित्याग करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। इस घड़े में से एक-एक बीज निकालकर उन्हें घी से भरे हुए गर्म कुंडों में अलग-अलग रखो और उनकी सावधानी से रक्षा करो।'
 
At this time a deep voice was heard from the sky - 'O King! Do not dare to do this. It is not right for you to abandon these sons of yours. Take out each seed from this pot and keep them separately in hot pots filled with ghee and protect them carefully. 21-22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)