अध्याय 106: राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना
श्लोक 1: लोमश कहते हैं - हे राजन! तब जगत् के पितामह भगवान ब्रह्मा ने अपने पास एकत्रित हुए समस्त देवताओं से कहा - 'देवताओं! इस समय आप सभी अपनी इच्छानुसार इच्छित स्थानों पर जा सकते हैं।
श्लोक 2-3h: अब बहुत काल के पश्चात् समुद्र पुनः अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ जाएगा। महाराज भगीरथ अपने कुल के लोगों (पितामहों) का उद्धार करने के उद्देश्य से समुद्र को पुनः गहरे जल से भर देंगे।॥2 1/2॥
श्लोक 3: ब्रह्माजी के ये वचन सुनकर अवसर की प्रतीक्षा करते हुए सभी श्रेष्ठ देवता जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार चले गए॥3॥
श्लोक 4: युधिष्ठिर ने पूछा- 'ब्रह्मन्! भगीरथ के सम्बन्धी समुद्र को भरने में किस प्रकार निमित्त बने? मुने! उनके निमित्त बनने का क्या कारण है? तथा भगीरथ के आश्रय से समुद्र किस प्रकार भर गया?'
श्लोक 5: हे तपस्वी! हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं आपसे राजाओं के उत्तम चरित्र का वर्णन करने वाला यह प्रसंग विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥5॥
श्लोक 6: वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! महात्मा धर्मराज के इस प्रकार पूछने पर महाबली ब्राह्मण लोमश ने महाबली राजा सगर का माहात्म्य सुनाया।
श्लोक 7: लोमशजी कहते हैं - हे राजन! इक्ष्वाकु वंश में सगर नाम के एक राजा हुए थे। वे सुन्दरता, धैर्य और बल से संपन्न थे तथा बड़े प्रतापी थे, किन्तु उनका कोई पुत्र नहीं था।
श्लोक 8: भरत! उसने हैहय और तालजंघ नामक क्षत्रियों का वध करके समस्त राजाओं को अपने अधीन कर लिया और स्वयं अपना राज्य चलाने लगा।
श्लोक 9: भरतश्रेष्ठ! राजा सगर की दो पत्नियाँ थीं - वैदर्भी और शैब्या। दोनों को अपने रूप और यौवन पर बड़ा गर्व था।
श्लोक 10-12: राजेन्द्र! राजा सगर अपनी दोनों पत्नियों के साथ कैलाश पर्वत पर जाकर पुत्र की इच्छा के अनुसार घोर तप करने लगे। योगयुक्त होकर घोर तप में तत्पर महाराज सगर ने त्रिपुरनाशक, त्रिनेत्रधारी, शंकर, भव, ईशान, शूलपाणि, पिनाकी, त्र्यम्बक, उग्रेश, बहुरूप और उमापति आदि नामों से प्रसिद्ध भगवान शिव के दर्शन किए॥10-12॥
श्लोक 13-14: वरदाता भगवान शिव को देखते ही महाबाहु राजा सगर ने अपनी दोनों पत्नियों सहित प्रणाम करके पुत्र प्राप्ति की प्रार्थना की। तब भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने पत्नी सहित नरश्रेष्ठ सगर से कहा - 'हे राजन! जिस समय में तुमने यहाँ वर माँगा है, उसका फल यही होगा।' 13-14॥
श्लोक 15-16: हे पुरुषश्रेष्ठ! आपकी एक पत्नी के गर्भ से साठ हज़ार बड़े ही अभिमानी और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न होंगे, किन्तु वे सब एक साथ ही नष्ट हो जाएँगे। हे राजन! आपकी दूसरी पत्नी के गर्भ से केवल एक ही पराक्रमी और वंशानुक्रम से सम्पन्न पुत्र उत्पन्न होगा।॥15-16॥
श्लोक 17-20: ऐसा कहकर भगवान शंकर वहाँ अन्तर्धान हो गए। राजा सगर भी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपनी पत्नियों सहित अपने निवासस्थान को चले गए। हे पुरुषश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी कमल के समान दो पत्नियाँ वैदर्भि और शैब्या गर्भवती हुईं। फिर समय आने पर वैदर्भि ने अपने गर्भ से एक तूंबी को जन्म दिया और शैब्या ने भगवान के समान सुन्दर रूप वाले एक पुत्र को जन्म दिया। राजा सगर ने उस तूंबी को फेंक देने का विचार किया। 17-20॥
श्लोक 21-22: इसी समय आकाशवाणी हुई - 'हे राजन! ऐसा करने का साहस मत करो। अपने इन पुत्रों का परित्याग करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। इस घड़े में से एक-एक बीज निकालकर उन्हें घी से भरे हुए गर्म कुंडों में अलग-अलग रखो और उनकी सावधानी से रक्षा करो।'
श्लोक 23: ‘पृथ्वीपति! ऐसा करने से तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। नरश्रेष्ठ! महादेवजी ने तुम्हें इसी क्रम से पुत्र उत्पन्न करने का निर्देश दिया है; अतः तुम्हें अन्य कोई विचार नहीं करना चाहिए। 23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥