श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 105: अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.105.6 
स पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा
गन्धर्वतूर्येषु नदत्सु सर्वश:।
दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणो
महार्णवं नि:सलिलं चकार॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जब देवतागण महर्षि अगस्त्य की स्तुति कर रहे थे, गन्धर्वों के वाद्यों की ध्वनि चारों ओर फैल रही थी और अगस्त्य पर दिव्य पुष्पों की वर्षा हो रही थी, उसी समय अगस्त्य ने सम्पूर्ण समुद्र को जलहीन कर दिया ॥6॥
 
In this manner, when the gods were praising the great saint Agastya, the sound of the instruments of the Gandharvas was spreading all around and divine flowers were being showered on Agastya, at that very moment Agastya made the entire ocean void of water. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)