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mahabharat 3.105.1-2: लोमशजी कहते हैं - हे राजन! मित्रावरुण के पुत्र भगवान अगस्त्य मुनि ने समुद्र तट पर जाकर एकत्रित देवताओं और ऋषियों से कहा - 'मैं लोक-कल्याण के लिए समुद्र का जल पी लूँगा। फिर तुम लोग जो भी कार्य करना हो, उसे शीघ्रतापूर्वक पूरा करो।'॥1-2॥   |   mahabharat अध्याय 3.105: अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 105: अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.105.1-2 
लोमश उवाच
समुद्रं स समासाद्य वारुणिर्भगवानृषि:।
उवाच सहितान् देवानृषींश्चैव समागतान्॥ १॥
अहं लोकहितार्थं वै पिबामि वरुणालयम्।
भवद्भिर्यदनुष्ठेयं तच्छीघ्रं संविधीयताम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं - हे राजन! मित्रावरुण के पुत्र भगवान अगस्त्य मुनि ने समुद्र तट पर जाकर एकत्रित देवताओं और ऋषियों से कहा - 'मैं लोक-कल्याण के लिए समुद्र का जल पी लूँगा। फिर तुम लोग जो भी कार्य करना हो, उसे शीघ्रतापूर्वक पूरा करो।'॥1-2॥
 
Lomashaji says - O King! Going to the seashore, Lord Agastya Muni, the son of Mitravaruna, said to the assembled Gods and sages - 'I will drink the water of the sea for the welfare of the people. Then you people should complete whatever work you have to do quickly.'॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)