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mahabharat 3.104.3-5: उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरि ने उनसे कहा - 'भास्कर! जैसे तुम प्रतिदिन मेरु की परिक्रमा करते हो, वैसे ही मेरी भी करो।' यह सुनकर भगवान सूर्य ने गिरिराज विन्ध्य से कहा - 'गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छा से मेरुगिरि की परिक्रमा नहीं करता। जिस विधाता ने इस जगत की रचना की है, उसी ने मेरे लिए यह मार्ग निश्चित किया है।'॥3-5॥   |   mahabharat अध्याय 3.104: अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 104: अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना  »  श्लोक 3-5
 
 
श्लोक  3.104.3-5 
तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्य: शैल: सूर्यमथाब्रवीत्।
यथा हि मेरुर्भवता नित्यश: परिगम्यते॥ ३॥
प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर।
एवमुक्तस्तत: सूर्य: शैलेन्द्रं प्रत्यभाषत॥ ४॥
नाहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम्।
एष मार्ग: प्रदिष्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरि ने उनसे कहा - 'भास्कर! जैसे तुम प्रतिदिन मेरु की परिक्रमा करते हो, वैसे ही मेरी भी करो।' यह सुनकर भगवान सूर्य ने गिरिराज विन्ध्य से कहा - 'गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छा से मेरुगिरि की परिक्रमा नहीं करता। जिस विधाता ने इस जगत की रचना की है, उसी ने मेरे लिए यह मार्ग निश्चित किया है।'॥3-5॥
 
Seeing him doing so, Vindhyagiri said to him - 'Bhaskar! Just as you circumambulate Meru daily, do the same for me.' Hearing this, Lord Surya said to Giriraj Vindhya - 'Girisreshtha! I do not circumambulate Merugiri of my own will. The Creator who has created this world, has decided this path for me.'॥ 3-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)