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mahabharat 3.104.12: हे पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्य से दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ। मेरी इच्छा है कि आप मुझे मार्ग दिखाएँ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 3.104: अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 104: अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.104.12 
मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम।
दक्षिणामभिगन्तास्मि दिशं कार्येण केनचित्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्य से दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ। मेरी इच्छा है कि आप मुझे मार्ग दिखाएँ॥12॥
 
'O best of mountains! I am going towards the south for some work. I wish that you show me the way.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)