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mahabharat 3.103.18: आप सदैव हम भयभीत देवताओं के शरणस्थल रहे हैं, अतः अब भी इस कठिन परिस्थिति में हम आपसे वर माँग रहे हैं; क्योंकि वर देने में आप ही समर्थ हैं॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.103: भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 103: भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.103.18 
अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान् गति:।
ततस्त्वार्ता: प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
आप सदैव हम भयभीत देवताओं के शरणस्थल रहे हैं, अतः अब भी इस कठिन परिस्थिति में हम आपसे वर माँग रहे हैं; क्योंकि वर देने में आप ही समर्थ हैं॥18॥
 
You have always been the refuge of us, the frightened gods. Hence, even now, in a difficult situation, we are asking for a boon from you; because only you are capable of granting a boon.॥ 18॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने त्र्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्य-वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)