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mahabharat 3.103.1: देवता कहते हैं - हे प्रभु! यौवन, अण्डज, स्वेदजन्य और वनस्पतिजन्य - इन चारों योनियों की सम्पूर्ण जनसंख्या आपकी कृपा से ही बढ़ती है। ये (मनुष्य) योनियाँ समृद्ध होने पर हवि और नैवेद्य से देवताओं का ही पोषण करती हैं॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.103: भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 103: भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.103.1 
देवा ऊचु:
तव प्रसादाद् वर्धन्ते प्रजा: सर्वाश्चतुर्विधा:।
ता भाविता भावयन्ति हव्यकव्यैर्दिवौकस:॥ १॥
 
 
अनुवाद
देवता कहते हैं - हे प्रभु! यौवन, अण्डज, स्वेदजन्य और वनस्पतिजन्य - इन चारों योनियों की सम्पूर्ण जनसंख्या आपकी कृपा से ही बढ़ती है। ये (मनुष्य) योनियाँ समृद्ध होने पर हवि और नैवेद्य से देवताओं का ही पोषण करती हैं॥1॥
 
The gods say - O Lord! The entire population of these four types - viviparous, oviparous, sweat-born and plant-born - grows only by your grace. On becoming prosperous, these (human) species only nourish the gods with oblations and offerings.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)