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mahabharat 3.102.2: वह सदैव रात्रि में क्रोध में आकर आश्रमों और तीर्थों में निवास करने वाले ऋषियों को खा जाता था॥2॥   |   mahabharat अध्याय 3.102: कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 102: कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.102.2 
ते रात्रौ समभिक्रुद्धा भक्षयन्ति सदा मुनीन्।
आश्रमेषु च ये सन्ति पुण्येष्वायतनेषु च॥ २॥
 
 
अनुवाद
वह सदैव रात्रि में क्रोध में आकर आश्रमों और तीर्थों में निवास करने वाले ऋषियों को खा जाता था॥2॥
 
He would always come in anger at night and devour the sages who resided in ashrams and holy places.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)